IGCSE Hindi (Second Language) Paper-1: Specimen Questions with Answers 135 - 139 of 143

Passage

भारत सरकार के एक उपक्रम ‘खादी’ ने देसी आहार का आरंभ किया है। वैसे तो यह कुछ समय पहले से ही प्राकृतिक ढंग से उगाए उत्पाद जैसे दालें, कॉफी और चावल बाजार में ला चुका है। इसके अलावा पुणे के समीप अनेक खेत पूर्णत: प्राकृतिक ढंग से फसल उगा रहे हैं। दार्जिंलिंग के चाय बगानों ने भी प्राकृतिक ढंग से चाय उगाने का प्रयोग आरंभ किया था जिसे अब एक दशक से अधिक समय हो गया है क्योंकि विदेशी उपभोक्ताओं दव्ारा प्राकृतिक ढंग से उगाई चाय की मांग बढ़ गई थी।

समस्त विश्व में मनुष्य दव्ारा उपभोग किये जाने वाले खाद्य पदार्थों में कीटनाशकों के अधिकाधिक बढ़ते प्रयोग के प्रति जागरूकता अब बढ़ गई है। प्राकृतिक रूप से उगाए पदार्थ वे हैं जिन्हें रासायनिक खाद या कीटनाशकों का प्रयोग किये बगैर प्राकृतिक ढंग से उगाया जाता है। यह एक समग्र अवधारणा है जिसके तहत खेती एवं कृषि कार्यों में प्रकृति के सिद्धांतों का प्रयोग किया जाता है।

प्राकृतिक खाद्य प्रदार्थों की मांग के पीछे एक अन्य कारण लोगों की स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रति जागरूकता में वृद्धि भी है। भारत सरकार के सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण मंत्रालय द्धारा चलाए जा रहे ऐसे एक कार्यक्रम की प्रबंधक ममता शर्मा कहती हैं, “अब लोग इन्हें खरीदने में रूचि दिखा रहे हैं, प्राकृतिक खाद्य पदार्थों को खरीदने में भारतीय किसी विदेशी से कम नहीं हैं। खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग दव्ारा आरंभ किये देसी आहार का उद्देश्य उपभोक्ता को पौष्टिक और रसायन मुक्त विकल्प प्रदान करना है। देसी आहार के अंतर्गत मिलने वाले उत्पादों की सूची लंबी है और इनमें बासमती चावल, भूरा चावल, चाय, कॉफी, दाल, मिर्च और शहद आदि शामिल हैं। ये सभी उत्पाद पूर्व उनलब्ध उत्पादों से बहुत बेहतर हैं।

आज ऐसे अनेक गैर-सरकारी संस्थान हैं जो प्राकृतिक शाकाहारिता को बढ़ावा दे रहे हैं। ऐसा ही एक संस्थान अहिंसा रिसर्च फाऊंडेशन है। इसके महासचिव एल. एन. मादी कहते हैं, “प्राकृतिक ढंग से उगाए कृषि उत्पादों का विवेचित मेल कहा जा सकता है। यह पर्यावरण अनुकूल परिवेश में उगाए शाकाहारी भोजन के उपभोग का प्रतीक है और इसमें वनस्पति, जीव जंतु या मानव जीवन को कोई हानि भी नहीं पहुंचती है। ऐसा भोजन न केवल स्वास्थ्यवर्द्धक होता है बल्कि शाकाहारिता के वास्तविक रूप का प्रतीक है।”

प्राकृतिक रूप से उगाए खाद्य पदार्थों के साथ-साथ अब प्राकृतिक रूप से उगाए कपास का चलन भी बढ़ता जा रहा है। कपास पर चूंकि हानिकारक कीटों का हमला अधिक होता है इसलिए कपास उगाने वाले किसान रासायनिक खादों और कीटनाशकों का सर्वाधिक प्रयोग करते हैं। कपास को जब प्राकृतिक ढंग से उगाया जाता है तो कीटों के प्रकोप की आशंका भी घटायी जाती है। इस ढंग से उगायी कपास भी उच्च कोटि की होती है। इससे तैयार सूती कपड़ा अधिक टिकाऊ होता है और इसकी दिखावट और चमक भी बेहतर होती है। भारत में कपास की प्राकृतिक ढंग से खेती मध्य प्रदेश में भोपाल के समीप और गुजरात में कच्छ के निकट होती है।

Question number: 135 (4 of 7 Based on Passage) Show Passage

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कितने समय पहले से चाय की खेती नए ढ़ग से शुरू की गई?

Explanation

एक दशक से अधिक समय से दार्जिलिंग में चाय की खेती नए ढ़ग से शुरू हुई।

Question number: 136 (5 of 7 Based on Passage) Show Passage

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Write in Short

प्राकृतिक प्रदार्थों की बढ़ती मांग के अन्य कारण क्या हैं?

Explanation

लोगो के स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रति जागरूकता में वृद्धि भी है।

Question number: 137 (6 of 7 Based on Passage) Show Passage

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Write in Short

प्राकृतिक ढ़ग से कपास उगाने के क्या फायदे मिलते हैं?

Explanation

प्राकृतिक ढ़ग से उगाई जाने वाली कपास उच्च कोटि की होती है। इससे तैयार सूती कपड़ा अधिक टिकाऊ होता है इससे इसकी दिखावट और चमक भी बेहतर होती है। भारत में गुजरात के निकट कच्छ व मध्य प्रदेश के निकट भोपाल में इस प्रकार की खेती की जाती है

Question number: 138 (7 of 7 Based on Passage) Show Passage

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Write in Short

खाद्य प्रदार्थों के अलावा अन्य किस चीज को उगाया जा रहा है?

Explanation

खाद्य प्रदार्थों के अलावा कपास को प्राकृतिक ढ़ग से उगाया जा सकता है।

Question number: 139

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Write in Short

निम्नलिखित लेख जो प्रदुषण की समस्या पर केन्द्रित है उसे पढ़ने के बाद संक्षेप में लेख के मुख्य पहलूओं को अपने शब्दों में लिखिए।

आपका लेख संक्षिप्त और 100 शब्दों से ज्य़ादा नहीं होना चाहिए।

पाठांश से वाक्य उतारना उचित नहीं है।

भयावह प्रदूषण

इस दुनिया के सामने यदि कोई खतरा सबसे भयावह है तो वह न तो बाहरी प्रतिस्पर्धा है और न ही गरीबी की बढ़ती फौज। जिस तरह धरती से लेकर आसमान तक प्रदूषण का दायरा बढ़ता जा रहा है, वह मानवता का सबसे बड़ा शत्रु बनता जा रहा है। ऐसा कोई क्षेत्र यहाँ बचा है जिस पर प्रदूषण की मार नहीं पड़ी हो। स्थिति यह है कि धरती पर रहना दूभर हो रहा है क्योंकि कहीं भी चले जाइए प्रदूषण बाँहे पसारे विनाश की दावत देता दिखाई दे रहा है।

‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ का कहना है कि सारी दुनिया में हर साल 30 लाख लोग घर के बाहर वायु प्रदूषण से अपनी जान गंवाते हैं। वाहनों तथा उद्योगों से निकली प्रदूषित वायु उन्हें इस दुनिया से ऊपर उठा देती है। घर के अंदर भी इंसान सुरक्षित नहीं है। लगभग 16 लाख लोग ख़ासकर गरीब के लोग घरों के अंदर ईंधन का उपयोग कर प्रदूषित वायु के शिकार होकर दुनिया को अलविदा कह जाते हैं।

वायु ही नहीं इस धरती पर अब जल भी सुरक्षित नहीं रहा है। विकासशील देशों में बीमार पड़ने और मरने वाले 80 प्रतिशत लोग जल-जनित रोगों के शिकार होते हैं। इन देशों में प्रति आठ सेकंड एक बच्चा जल-जनित रोग का शिकार होकर दम तोड़ देता है। प्रति वर्ष डायरिया और प्रदूषित जल से 21 लाख लोग इस दुनिया से कूच कर जाते हैं।

Explanation

लेख

आज के विज्ञान-युग में प्रदुषण की समस्या एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। उद्योगों के विस्तार के कारण प्रदुषण और भी अधिक बढ़ गया है। धरती का वायुमंडल इतना विषैला हो गया है कि किसी भीड़ भरे चौराहे पर सांस लेने में भी दिक्कत महसूस होने लगती है। उपयोगिता के हाथों प्राकृतिक साधनों का अंधा-धुंध दोहन हुआ है, परिणामस्वरूप वातावरण में निरंतर प्रदुषण बढ़ा ही है। आज स्थिति यह हो गई है कि न केवल हवा बल्कि जल-स्त्रोत भी दूषित हो गए हैं। यदि हम अब भी संभले नहीं तो विनाशकारी परिणाम शीघ्र सामने आएँगे।