IGCSE Hindi (Second Language) Paper-1: Specimen Questions with Answers 83 - 87 of 143

Passage

प्रसिद्ध सितार वादक अनुष्का शंकर से पत्रकार विभा की बातचीत के कुछ अंश

विभा- अपने बचपन के बारे में कुछ बताइए?

अनुष्का-मेरा जन्म लंदन में हुआ। अपने बचपन के पहले दस साल मैंने लंदन में बिताए। मुझे नौ साल की उम्र से सितार बजाने की शिक्षा मिली। आप जानती हैं कि यह शिक्षा मुझे अपने पिता और सितार के जाने माने कलाकार पंडित रवि शंकर से मिली। अपने बचपन के दस साल लंदन में बिताने के बाद मैं 11 साल की उम्र में केलिफोर्निया चली गई। और मैंने संगीत की पहली प्रस्तुति 13 साल की उम्र में की।

विभा- इतनी कम उम्र से सितार बजाना आपने शुरू किया तो क्या आपने शुरू से ही पेशेयर सितार वादक बनना चाहती थीं?

अनुष्का- मेरे मन में पेशेयर सितार वादक बनने की इच्छा तेज तब हुई जब मैं लगातार सितार बजाती रही। शुरू में तो सिर्फ जानने की कोशिश ही करती रही। सितार के प्रति लगाव पैदा करने में मुझे कुछ साल तो लगे। हालांकि मैं हमेशा सितार सुनती रहती थी लेकिन मैं इसे अपने जीवन में अपनाऊँ या नहीं इसके बारे में मैं पूरी तरह से सोच नहीं पाई थी।

विभा- इस कला को सीखने में मेहनत और साधना के अलावा आपके परिवार की क्या भूमिका रही?

अनुष्का- जो मैंने सीखा उसमें परिवार की परंपरा, सम्मान इस कदर शामिल था कि मैंने बचपन से किसी बात के लिए पिता को न करना या मना करना नहीं सीखा। यद्यपि यह सही है कि मेरे माता पिता ने हमेशा वह सबकुछ करने दिया जो मैं करना चाहती थी। छुट्‌िटयां में अपने दोस्तों के साथ मैं जहां भी जाना चाहती थीं, मेरे माता पिता जाने देते थे।

विभा-यह बताइए कि अब तक आपके कितने एलबम आ चुके हैं?

अनुष्का-अब तक मेरे तीन एलबम आ चुके हैं। पहला एलबम मेरे अपने नाम से ही आया था यानी ‘अनुष्का’। उसके बाद सन्‌ 2000 में ‘अनुराग’ नामक एलबम आया। तीसरा एलबम ‘लाईव करनेगी हॉल’ नाम से जारी किया गया है।

विभा-क्या आपको अपनी बहन नोरा जोन्स की सफलता से किसी किसम की जलन होती है? वह भी पूरी दुनिया में काफी मशहूर गायिका रहीं हैं।

अनुष्का- मुझे लगता है कि मेरा जलना कुछ ऐसा ही होगा जैसे कि मैं ब्रिटनी रिपयर्स से जलूं। हम दोनों दो अलग किस्म का संगीत बजाते हैं और इसके बीच में किसी तरह की तुलना करना ठीक नहीं है। इसलिए अगर मैं अपनी बहन से जलूं तो यह बिल्कुल ठीक नहीं लगता।

आप अनुष्का शंकर के बारे में एक लेख लिखना चाहते हैं। नीचे लिखे शीर्षक या पहलूओं से जुड़ी बातों को संक्षेप में लिखिए।

Question 83 (2 of 5 Based on Passage)

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संगीत एलबम

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अब तक मेरे तीन एलबम आ चुके हैं। पहला एलबम मेरे अपने नाम से ही आया था यानी ‘अनुष्का’। उसके बाद सन्‌ 2000 में ‘अनुराग’ नामक एलबम आया। तीसरा एलबम ‘लाईव करनेगी हॉल’ नाम से जारी किया गया है।

Question 84 (3 of 5 Based on Passage)

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बहन से तुलना

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हम दोनों दो अलग किस्म का संगीत बजाते हैं और इसके बीच में किसी तरह की तुलना करना ठीक नहीं है।

Question 85 (4 of 5 Based on Passage)

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परिवार की भूमिका

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जो मैंने सीखा उसमें परिवार की परंपरा, सम्मान इस कदर शामिल था कि मैंने बचपन से किसी बात के लिए पिता को न करना या मना करना नहीं सीखा। यद्यपि यह सही है कि मेरे माता पिता ने हमेशा वह सबकुछ करने दिया जो मैं करना चाहती थी।

Question 86 (5 of 5 Based on Passage)

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बचपन

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मेरा जन्म लंदन में हुआ। अपने बचपन के पहले दस साल मैंने लंदन में बिताए। मुझे नौ साल की उम्र से सितार बजाने की शिक्षा मिली। आप जानती हैं कि यह शिक्षा मुझे अपने पिता और सितार के जाने माने कलाकार पंडित रवि शंकर से मिली। मैंने संगीत की पहली प्रस्तुति 13 साल की उम्र में की।

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सदभाव का उत्सव ‘फूल वालों की सैर’

राष्ट्रीय एकता और सांप्रदायिक सदभाव का उत्सव ‘फूल वालों की सैर एक अनूठे मैले के रूप में चर्चित रहा है जिसका आयोजन अंजुमन-सैर-ए-गुल फरोशाँ नामक संस्था सन्‌ 1961 में लगातार करती आ रही है। इस समारोह का आकर्षण हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक रंग-बिरंगा पंखा है जो हर साल उपराज्यपाल को पेश किया जाता है।

फूलवालों का काफ़िला लाल किले से इत्र और फूलों की सुगंध बिखेरता हुआ 32 किलोमीटर की दूरी तय करके महरौली स्थित कुतुब मीनार के करीब ख्य़ाजा बख्त़ियार काफी की मज़ार पर फूलों की चादर चढ़ाने हर साल आता है। दूसरे दिन परंपरागत ढंग से इसी मज़ार के समीप योगमाया महालक्ष्मी मंदिर में फूलों का छत्र चढ़ाया जाता है। इस मेले का समापन शनिवार को ‘जहाज महल’ में एक भव्य समारोह के साथ होता है। इस मौके पर रात भर कव्वाली और नृत्य के बीच जश्न का माहौल रहता है। पुरानी दिल्ली के निवासी मोहम्मद शम्सी कहते हैं कि “समय के साथ इस मेले की रौनक कम हो गई है। बस रस्म ही रह गई है। मैं यहाँ हर साल आता हूँ पर अब पहले वाला आनंद नहीं मिलता है।”

‘फूलवालों की सैर’ की शुरूआत अकबर शाह दव्तीय (1806 - 1837) के शासन काल में हुई। बादशाह अपने छोटे पुत्र मिर्ज़ा जहाँगीर को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। ब्रिटिश रेजीडेंट सर सीटन ने इस बात को मंजूर नहीं किया। मिर्ज़ा जहाँगीर ने खुले दरबार में उनका अपमान किया। एक दिन जब शाहज़ादा लालकिले में नौबतखाने पर मौज मना रहा था तभी वहाँ से सीटन हाथी पर गुजरा। मिर्ज़ा जहाँगीर ने उस पर गोली चलाई।

रेजीडेंट तो बच गया, लेकिन उसका सेवक मारा गया। इसी आरोप में शाहज़ादे को इलाहाबाद के लिए निर्वासित कर दिया गया। उनकी माँ ने उसी समय अपने बेटे के बरी होने पर ख्य़ाजा बख्तियार काफी के मजार पर फूलों की चादर चढ़ाने की मन्न्त मानी और फिर अपने बेटे की रिहाई पर फूलों की चादर चढ़ा कर अपनी मन्नत पूरी की। दिल्ली के हिंदुओं ने योगमाया मंदिर में भेंट चढ़ाकर अपनी भागीदारी निभाई। यह तीन दिनों का समारोह इतना शानदार रहा कि बादशाह ने इसे हर साल मनाने का ऐलान किया। 1942 में अग्रेंजों ने इसे बंद कर दिया लेकिन 1961 में अंजुमन सैरे-गुलफ़रोशाँ की कोशिश से यह दोबारा शुरू हुआ और तब से आज तक सिलसिला जारी हैं।

Question 87 (1 of 6 Based on Passage)

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इस मौके पर हिंदुओं ने क्या किया?

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दिल्ली के हिंदुओं ने योगमाया मंदिर में भेंट चढ़ाकर अपनी भागीदारी निभाई।

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