IGCSE Hindi (Second Language) Paper-1: Specimen Questions with Answers 61 - 61 of 143

Question 61

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निम्नलिखित आलेख के आधार पर एक लेख लिखिए और बताइए कि फिल्म निर्माण किस रूप में बदल रहा है? आलेख की मुख्य बातों को अपने शब्दों में लिखिए।

आपका आलेख 100 शब्दों से अधिक नहीं होना चाहिए। संगत बिन्दुओं के समावेश पर 6 अंक और भाषिक अभिव्यक्ति के लिए 4 अंक निर्धारित हैं। पाठांश से वाक्य उतारना उचित नहीं है।

छोटे बजट की फिल्मों का नया अवतार

संजय लीला भंसाली, सुभाष घई, राकेश रोशन, यश चोपड़ा जैसे बड़े निर्माताओं की फिल्में बड़े ज़ोखिम पर लटकी रहती हैं, जो कभी सफल हो जाती हैं तो कभी पिट जाती हैं। इसके बावजूद राजश्री प्रोडक्शन जैसी फिल्म निर्माण कंपनी बड़े बजट की फिल्मों से परहेज नहीं करती, लेकिन महेश भट्‌ट, मधुर भंडारकर, प्रियदर्शन जैसे फिल्मकार छोटे बजट की फिल्मों को लेकर फिल्म बाज़ार की दुनिया में सफलता का झंडा लहरा रहे हैं। बदलते समय के साथ छोटे बजट की फिल्मों की सफलता का आलम यह है कि आज 25 - 50 लाख रूपए जेब में रखने वाले लोग भी फिल्म बनाने की हिम्मत जुटा लेते हैं और मल्टीप्लेक्स की मेहरबानी से फिल्में चला भी लेते हैं।

फिल्मों के सफल होने का पैमाना कभी बड़ा कलाकार होता था, कभी बड़ा बैनर तो कभी बड़ा बजट। मगर अब नए-नए कलाकारों को लेकर कुछ ही दिनों में कम बजट में फिल्में तैयार कर ली जाती हैं। अब यह जमाना लदता जा रहा है, जब बोलीवुड में एक फिल्म बनने में सालों लग जाते थे और उनके जैसे बड़े निर्माता भी आज ‘राज’, ‘पाप’ जैसी छोटे बजट की फिल्में बना रहे हैं और फिल्में सफल भी हो रही हैं। फिल्मों का स्वरूप् इस कदर बदला है कि अब इन फिल्मों का बजट ही नहीं, इनकी लंबाई भी कम हो गई है। अब तीन घंटे की फिल्म के लिए समय निकालना दर्शकों के लिए भी मुश्किल है और निर्माता दर्शकों की इस मुश्किल को देखते हुए डेढ़ से दो घंटे की फिल्में बनाने लगे हैं।

बदले समय में टिकटों की ब्रिकी का समीकरण भी बदल गया है। आज ज़रूरी नहीं है कि सिनेमाहॉल दर्शकों से खचाखच भरा हो। आज बेशक 30 - 35 फीसदी टिकटें बिक पाती हैं, लेकिन उसमें भी निर्माताओं को लाभ ही होता हैं कभी निर्माता सिनेमाघर के टिकटों की ब्रिकी से अपनी फिल्म की कामयाबी का हिसाब लगाते थे। अगर फिल्म बड़े बजट या बड़े सितारों वाली है तो बाज़ार में आने के पहले ही आधे पैसे मिल जाते थे। लेकिन अब ऐसी स्थिति नहीं है। जिन फिल्मों को पूरे तामझाम के साथ बॉक्स ऑफिस पर प्रदर्शित किया गया। उनमें से अधिकांश फिसड्‌डी साबित हुई। यह निष्कर्ष वाकई आंखे खोल देने वाला है। इस साल 50 फिल्मों में से मुश्किल से छह फिल्में ही हिट हो पाई। छोटे बजट की फिल्मों ने कई अल्पचर्चित कलाकारों की सुर्खियां दिलाई। इनमें से कई अभिनेताओं ने उसे जमें-जमाये अभिनेताओं को भी बेहतरीन प्रदर्शन के मामले में पीछे छोड़ दिया। सिने प्रेमियों की बदलती फिल्म रुचियों को ध्यान में रखकर अनूठे नाम और अनूठी कथा वाली कई अभिनवधर्मी फिल्में आई हैं।

Explanation

लेख

यह बात आज के जमाने में बिलकुल सही है छोटे बजट में जो फिल्में बनती है व जिस फिल्म का समय भी कम होता हैं। वे ही फिल्म सफल होती है क्योंकि आज के समय में काम के कारण तीन चार घंटे फिल्म देखने का समय किसी को नहीं रहता हैं। इन फिल्म के सफल होने के कई कारण होते है जैसे नए-नए कलाकार का आना, बड़ा बैनर आदि कारणों के कारण लोग छोटे बजट में फिल्म बन लेते हैं।

पहले एक फिल्म बनने में सालो लग जाते थें। पर उनके निर्माता भी आज छोटे बजट से फिल्म बना लेते हैं। अब देखा जाए फिल्मों का पूरा रूप ही बदल गया हैं। फिल्मों के लिए जो यह छोटे बजट है आज के जमाने में सही हैं।

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