CIE Hindi Paper-1: Specimen Questions 141 - 142 of 143

Question number: 141

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Describe in Detail

आज का संगीत सिर्फ़ शोर है?

आपके स्कूल में एक वाद-विवाद प्रतियोगिता आयोजित की जा रही है जिसका विषय है ’आज का संगीत सिर्फ़ शोर है और कुछ नहीं’। आप इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेना चाहते हैं। अपने विचारों को विषय के पक्ष में प्रस्तुत करने के उद्देश्य से उत्तर लिखिए।

आपका उत्तर 150 या 200 शब्दों से ज्यादा का नहीं होना चाहिए।

लिखित उत्तर पर अंक विषय संबंधी अंर्तवस्तु, शैली और सही भाषा लिखने पर दिए जाएंगे।

Explanation

आज का संगीत सिर्फ शौर है यह बात सही हैं। क्योंकि पहले जो संगीत आता था वह संगीत हमारे दिल तक पहुंचता था। सुनने में भी मधुर लगता हैं। ऐसा संगीत सुनकर लोग मंत्र मुक्ध हो जाते थें। आज भी अगर हम पहले के गाने सुनते हैं तो हमारा मन खुश हो जाता हैं। लेकिन अब सगींत का रूप ही बदल गया हैं केवल इनमें शौर के अलावा ओर कुछ है ही नहीं बच्चों से बड़ों तक के गाने सही रूप से नहीं आते हैं। कुछ गानों में तो केवल शौर ही होता और गाना भी समझ में नहीं आता हैं। न गानों के बोल समझ में आते हैं। लेकिन फिर भी आज की पीढ़ी इन्हीं गानों को पंसद करती हैं। भले ही उस गाने का कोई भी अर्थ न हो।

संगीत को हमें ऐसा सुनना चाहिए कि किसी को तकलीफ भी न हो और वो हमारे मन को खुश करें। संगीत एक आराधना है इसे ऐसे ही व्यर्थ मत किजिए। इसलिए संगीत को शौर का रूप मत दीजिए क्योंकि अगर ऐसा किया तो यह एक तरह से ध्वनि प्रदूषण में आता हैं। इस संगीत की पूजा किजिए और इसे शौर में न बदलिए।

Passage

दुकान क्या है, एक झोली में समा जाए बस इतने ही खिलौने हैं उनके पास, लेकिन इनकी विशेषता है कि ये एल्युमिनियम के तारों से बनाए जाते हैं। गुजरात के कच्छ इलाके से आए राजू अपना असली नाम नहीं बताते और कहते हैं कि उन्हें लोग महागुरू राजू के नाम से जानते हैं। वह कहते हैं, ”आप बोलिए जो बनावट या रूप बनाना हैं आपके सामने बना दूंगा। एक तार को मोड़ मोड़ का आपका चेहरा बना दूंगा। यही मेरी कला है।” अल्युमिनियम के एक ही तार को मोड़ कर राजू, साइकिल, रिक्शा, बुद्ध की मूर्ति और न जाने क्या क्या बना लेते हैं।

राजू 35 वर्ष पहले लखनऊ आए और फुटपाथ पर ही घूमते फिरते एल्युमिनियम का काम सीखा। वह कहते हैं, ”इधर एक फ़ौजी अंकल हुआ करते थे जो तारों का काम करते थे। उन्हें मैंने टीवी पर भी देखा है। मैं उनको चाय देता था और बदले में काम सीखता था। ”लेकिन यही काम क्यों? राजू कहते हैं, ”असल में मुझे फ़िल्म देखने का शौक था और उसके लिए पैसे चाहिए होते थे। फ़ौजी अंकल कुछ पैसे देते थे तो फ़िल्म देखता था।”

राजू सिकंदर आर्ट गैलरी के पास बैठकर खिलौने बेचता है और उनके ग्राहकों में कई विदेशी भी शामिल हैं। वह बताते हैं, ”मुझे सबसे बड़ा आर्डर जर्मनी के एक व्यक्ति ने दिया था एक हज़ार साइकिल बनाने का। उसमें मैंने पैसा बनाया लेकिन मुझे अपने माता पिता को पैसे भेजने होते हैं।”

राजू के डिजाइन कई बड़े कलाकार भी खरीदते हैं। राजू बताते हैं कि उनके पास नामी गिरामी चित्रकार भी आया करते थे। राजू दावा करते हैं कि उन्हाेेंने लखनऊ के बगीचों में और चौराहों पर लगी कई मूर्तियों को भी आकार दिया हैं। लेकिन वह इस बात का बुरा नहीं मानते कि उन्हें इसका कोई श्रेय नहीं मिलता। वह कहते हैं, ”हम तो गरीब आदमी हैं। कला आती है लेकिन हमारे संबंध वैसे नहीं हैं। मुझसे कई कलाकार आकर कृतियां बनवाते हैं और अच्छे पैसे देते हैं। मैं इसमें खुश हूं।” सिकंदर आर्ट गैलरी के पास तारों का यह जादूगर बैठे बैठे कई कलाकृतियों को अंजाम दे देता है। कला उसके लिए मायने रखती है लेकिन मशहूर होना उसकी प्राथमिकता नहीं है। महागुरू राजू की जरूरत रोटी है और वह फुटपाथ पर अपनी कला बेचकर मिलने वाली रोटी से खुश रहते हैं।

Question number: 142 (5 of 6 Based on Passage) Show Passage

Short Answer Question▾

Write in Short

राजू की प्रमुख आवश्यकता क्या है?

Explanation

महागुरू राजू की प्रमुख जरूरत रोटी है और वह फुटपाथ पर अपनी कला बेचकर मिलने वाली रोटी से खुश रहते हैं।

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