CIE Hindi Paper-1: Specimen Questions 113 - 118 of 143

Passage

’जिस्म तो टूटा, मन नहीं’

राजस्थान के एक दुरस्थ मरूस्थली गांव सुई में एक दुर्घटना के बाद विकलांग बनी ज़िंदगी को ग्रामीण बुजुर्ग शिशुपाल सिंह ने ऐसे बदला जैसे वे स्वयं जीता जागता रेडियो बन गए हो। शिशुपाल पिछले दो दशक से अपने बिस्तर से ही हर रोज़ पूरे गांव को ख़बरें सुनाते हैं। वे ज़रूरी सूचनाएं भी प्रसारित करते हैं। इसके लिए शिशुपाल एक माइक और लाउडस्पीकर का सहारा लेते है। उनके प्रसारण में कभी रेडियों की ख़बरें, कभी उपयोगी सूचनाएं और कभी जीवन दशैन की सूक्तियां शामिल होती है।

दुर्घटना के बाद शिशुपाल की ज़िंदगी एक कमरे में क़ैद होकर रह गई वह खुद तो दुनिया से कट गए, लेकिन अपने गांव को इस प्रसारण के ज़रिए दुनिया से जोड़े रखा। बीकानेर से कोई 150 किलोमीटर का सफ़र तय कर हम जब सुई गांव पहुंचे तो शिशुपाल अतीत की यादों में खोए मिले। वे कहने लगे-”मैं उस समय दुर्घटना का शिकार हो गया जब सामाजिक कार्य से कहीं जा रहा था। इसमें मेरी रीढ़ की हड्‌डी टूट गई और फिर मैं कभी उठ न सका।”

शिशुपाल कहते हैं, मैं हर रोज़ सुबह उठकर लाउडस्पीकर के ज़रिए लोगों का अभिवादन करता हूँ। उन्हें कहता हूँ कि सवेरा हो गया है, नित्य काम में जुट जाएं। इसके बाद मैं कुछ भजन तथा देश-विदेश की ख़बरें भी गांव वालों को सुनाता हूँ। लोगों से आग्रह करता हूँ कि बच्चों को अच्छी शिक्षा दें। लोगों को नशे से दूर रहने को कहता हूँ।”

गांव के हरफूल कहते हैं कि ”अगर किसी का मवेशी खो जाए, या राशन का गेहूं बंटने के लिए आया हो, शिशुपाल अपने इस प्रसारण यंत्र के ज़रिए पूरे गांव को ख़बर दे देते हैं। कई बार उनके प्रसारण से खोए हुए मवेशी ग्रामीणों को वापस मिल जाते हैं, यहाँ तक कि गायब हुए आभूषण भी वापस मिलें है। हमारे लिए शिशुपाल जी बहुत अच्छा काम करते हैं”

ऐसे समय जब कुछ टीवी चैनल ख़बरों से ज्यादा विज्ञापन प्रसारित करते हों और सूचनाएं मुनाफे की भेंट चढ़ जाती हो, ये शिशुपाल का उत्साह ही है कि विकलांग ज़िंदगी के बावजूद वे समाज के लिए ख़बरेें सुनाते हैं। दुर्घटना ने उनका जिस्म तो तोड़ा लेकिन शिशुपाल ने अपने मन को नहीं टुटने दिया।

Question number: 113 (1 of 5 Based on Passage) Show Passage

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Write in Short

शिशुपाल को दुर्घटना के बाद भी रेडियों की संज्ञा क्यों दी गई?

Explanation

शिशुपाल का उत्साह ही है कि विकलांग ज़िंदगी के बावजूद वे समाज के लिए ख़बरेें सुनाते हैं। दुर्घटना ने उनका जिस्म तो तोड़ा लेकिन शिशुपाल ने अपने मन को नहीं टुटने दिया।

Question number: 114 (2 of 5 Based on Passage) Show Passage

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Write in Short

क्यों कुछ टी. वी. चैनल उपयोगी जानकारी देने में पीछे रह जाते हैं?

Explanation

क्योंकि जब कुछ टीवी चैनल ख़बरों से ज्यादा विज्ञापन प्रसारित करते हों और सूचनाएं मुनाफे की भेंट चढ़ जाती है तो …. उपयोगी जानकारी देने से पीछे रह जाते हैं।

Question number: 115 (3 of 5 Based on Passage) Show Passage

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Write in Short

शिशुपाल के प्रसारण से गांव को क्या मुख्य फायदे हुए हैं? कोई दो उदाहरण दिजिए।

Explanation

1 … उनके प्रसारण से खोए हुए मवेशी ग्रामीणों को वापस मिल जाते हैं।

2 … यहाँ तक कि गायब हुए आभूषण भी वापस मिलें है।

Question number: 116 (4 of 5 Based on Passage) Show Passage

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Write in Short

शिशुपाल किस माध्यम से सूचनाएं गांव तक पहुंचाते हैं?

Explanation

शिशुपाल एक माइक और लाउडस्पीकर का सहारा लेते है और सूचनाएं गांव तक पहुंचाते हैं।

Question number: 117 (5 of 5 Based on Passage) Show Passage

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Write in Short

शिशुपाल किस कार्य के लिए प्रोत्साहित नहीं करते हैं?

Explanation

बच्चों को अच्छी शिक्षा न देनेें व लोगों को नशे में रहने के लिए प्रोत्साहित नहीं करते थें।

Question number: 118

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Describe in Detail

निम्नलिखित आलेख के आधार पर सारांश लिखिए जिसके दव्ारा ’मैती आंदोलन’ के विकास और प्रभाव संबंधी बातें शामिल की जा सकें।

आपका सारांश 100 शब्दाेें से अधिक का नहीं होना चाहिए।

संगत बिन्दुओं के समावेश के लिए 6 अंक और भाषिक अभिव्यक्ति के लिए 4 अंक निर्धारित हैं। पाठांश से वाक्य उतारना उचित नहीं है।

उपहार में मिली हरयाली

”पैसे दे दो, जूते ले लों” इस गीत के बोल चाहे जिस तरह के भी हों, विवाह के अवसर पर दून्हे के जूते चूराकर नेग लेने की परंपरा बहुत पुरानी है। लेकिन उत्तर भारत की लड़कियों ने शादी के लिए आए दूल्हों के जूते चुरा कर उनसे नेग लेने के रिवाज को बदल दिया है। वे अब दूल्हों के जुते नहीं चुराती बल्कि उनसे अपने मैत यानी मायके में पेड़ लगवाती हैं। वन संरक्षण की इस नई रस्म को मैती आंदोलन का नाम दिया गया है। इसकी चर्चा देश भर में हो रही है।

अब यह आंदोलन उत्तराखंड सहित भारत के आठ राज्यों में भी अपनी जड़ें जमा चुका है। चार राज्यों में तो वहां की पाठ्‌य पुस्तकों में भी इस आंदोलन की गाथा को स्थान दिया गया है। कनाडा में मैती आंदोलन की क्ष़बर पढ़ कर वहां ेी पूर्व प्रधानमंत्री फ्लोरा डोनल्ड आंदोलन के प्रवर्तक कल्याण सिंह रावत से मिलने गोचर आ गई। वे मैती परंपरा से इतना प्रभावित हुई कि उनहोंने इसका कनाडा में प्रचार प्रसार शुरू कर दिया। अब वहां भी विवाह के मौके पर पेड़ लगाए जाने लगे हैं। मैती परंपरा से प्रभावित होकर कनाडा सहित अमेरिका, ऑस्ट्रिया, नार्वे, चीन, थाईलैंड और नेपाल में भी विवाह के मौके पर पेड़ लगाए जाने लगे हैं।

मैती आंदोलन की भावनाओं से प्रेरित होकर अब लोग जहां पेड़ लगा रहे हैं वहीं उनके व्यवहार भी बदल रहे हैं। पर्यावरण के प्रति उनकी सोच में भी परिवर्तन आ रहा है। यही वजह है कि अब लोग अपने आस पास के जंगलों को बचाने और इनके संवर्धन में भी सहयोग देने लगे हैं। इस आंदोलन के कारण पहाड़ों पर काफ़ी हरयाली दिखने लगी है और सरकारों को अब अपने वृक्षारोपण कार्यक्रम के बारे में सोचने पर विवश कर दिया हैं।

पर्यावरण संरक्षण के लगातार बढ़ते इस अभियान को अपनी परिकल्पना और संकल्प से जन्म देने वाले कल्याण सिंह रावत ने कभी सोचा भी नहीं था कि उनकी प्रेरणा से उत्तराखंड के एक गांव से शुरू हुआ यह अभियान एक विराट और स्वंय स्फूर्त आंदोलन में बदल जाएगा।

Explanation

’’मैती आंदोलन’ के विकास और प्रभाव

यह आंदोलन वन संरक्षण के ऊपर है ऐसे तो वनों को बचाने के लिए कई अंादोलन हुए ओर वे सफल भी हुए लेकिन यह आंदोलन कुछ अलग ही हैं। क्योंकि इसमें ऐसे रिवाज या रस्म को वन संरक्षण के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। जो आगे जाकर यह देश विदेश तक पहुंच गया। इसका प्रभाव इतना पड़ा कि इस आंदोलन ने कई जंगलों को कटने से बचा लिया व इससे चारों ओर हरियाली नजर आने लगी। आज हम सब को भी वनों को बचाने के लिए हर जगह लोगों को जागरूक करना चाहिए। हरयाली के लिए घरों में, ऑफिस में, बगीचों में, स्कुलों में आदि जगहों पर वृक्ष लगाकर चारो ओर हरयाली करनी चाहिए। ऐसे कार्यक्रमों में सरकार को भी अपनी भागीदारी देनी चाहिए। क्योंकि वन प्रकृति का अनुपम उपहार हैं। इसलिए इसे बनाए रखने की हम सबकी जिम्मेदारी हैं। इस मैती आंदोलन से एक लड़की को विवाह स्वरूप उसके रस्म में हरियाली मिलती हैं। यह हरियाली सदैव बनाऐ रखें। यही इस आंदोलन का उद्देश्य हैं।

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