CIE Hindi Paper-1: Specimen Questions 62 - 67 of 143

Passage

श्री सुब्रत रॉय और ’सहारा’ की कहानी किसी भी भारतीय के लिए प्रेरणास्त्रोत से कम नहीं हैं मात्र दो हजार रूपए की पूंजी को आज उन्होंने 32 हजार करोड़ रूपए की परिसंपत्ति आधार में तब्दील कर दिया है। ’सहारा’ समूह की सफलता से लेकर विवादों तक जूड़े मुद्दों पर सहारा श्री से राजेंद्र तिवारी की बातचीत।

राजेंद्र: - आपकी सफलता का रहस्य क्या हैं?

सुब्रत: - मनुष्य के अंदर ढेर सारी ऊर्जा है। यह भावनाओं से जागती है। ज्यादातर लोगों का दायरा छोटा होता है। पत्नी और बच्चे। बच्चे ठीक निकल गए, बेटी-बेटीें का ब्याह हो गया, बस अब क्या चिंता। भावना और कर्त्तव्य एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। जहां भावना होती है, वहीं कर्त्तव्य होता है। आप अपने परिवार से जुड़े हैं और अपना कर्त्तव्य परिवार के प्रति समझते हैं। आपका परिवार एक सीमित दायरे में है और मेरा परिवार बहुत बड़ा है। इसमें छह लाख से ज्यादा सदस्य है। इस लिहाज से मेरे कर्त्तव्य भी बड़े हैं।

रार्जेंद्र-शिक्षित इंजीनियर होने के बावजूद अपने लिए आपने पैरा बैकिंग का क्षेत्र क्यों चुना?

सुब्रत- मेरे पिताजी भी इंजीनियर थे और मैंने भी इंजीनियर की पढ़ाई की। पिताजी की शिक्षा थी कि कोई काम छोटा बड़ा नहीं होता है। काम करने के तरीके पर सब निर्भर करता है। कोई बड़ा काम भी घटिया तरीके से किया जाए, तो वह तुच्छ लगेगा।

रार्जेंद्र- मीडिया व्यवसाय में रणनीति बदलने के पीछे क्या सोच काम कर रही है?

सुब्रत- मैं समझता हूं कि मनुष्य खबरों को जल्द से जल्द पाना चाहता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया यह काम कर सकता है लेकिन उसमें स्थानीय खबरों पर जोर नहीं है। दैनिक अखबार स्थानीय खबरों के आधार पर चलते हैं। हमने सोचा क्यों न हम स्थानीय खबरों को इलेक्ट्रॉनिक चैनल पर दिखाएं। लेकिन चैनल पर खबरों की विवेचना व विस्तार नहीं दिया जा सकता इसलिए हमने साप्ताहिक निकाला।

रार्जेंद्र- सहारा समूह की आगे बढ़ने की क्या योजनाएं हैं?

सुब्रत हम बीमा क्षेत्र में उतर रहें हैं। हाउसिंग फाइनेंस का विस्तार कर रहे हैं। इसके अलावा, हम सुंदरबन को विश्वस्तरीय सुविधाओं वाले पर्यावरण मित्र पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की गौरवशाली परियोजना शुरू करने वाले हैं।

रार्जेंद्र-फिल्मों के क्षेत्र में आपकी ख़ासी रुचि देखने को मिल रही हैं?

सुब्रत-फिल्म के क्षेत्र में हालांकि अभी हम बहुत कुछ नहीं कर रहे हैं। अभी हमारी एक फिल्म बन रही है ’नेताजी सुभाषचंद्र बोस’। अलबत्ता, फिल्म प्रदर्शन के क्षेत्र में हम एक बड़ी योजना बना रहे हैं। जिन 101 शहरों में हम अपनी आवासीय योजना शुरु करने वाले हैं, वहां हम अत्याधुनिक सिने कॉम्पलेक्स बनाएंगे। इन मल्टीप्लेक्स को उपग्रहों के ज़रिए जोड़ा जाएगा।

रार्जेंद्र-तेजी से बढ़ते सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भी विविधीकरण की योजना है?

सुब्रत-आई टी बहुत बड़ा क्षेत्र है। एंबी वैली में हम हिंदुस्तान का सबसे बड़ा व आधुनिकतम सॉफ्टवेयर केन्द्र बनाने जा रहे हैं। हम लोग एक क्षेत्र में बहुत ज्यादा रुचि रख रहे हैं और वह है ई-एजुकेशन। व्यक्तिगत रूप से मेरा मन इसमें लगा हैं हम चाहते हैं कि घर-घर में अच्छी शिक्षा पहुंचे यह एक बड़ा कार्य है और इसमें समय लगा रहे हैं। हम लोग अपना एक शिक्षा केन्द्र बनाने जा रहे हैं।

Question number: 62 (1 of 4 Based on Passage) Show Passage

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एंबी वैली योजना के तहत घर-घर में शिक्षा कैसे पहुँचाई जाएगी?

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एंबी वैली में हम हिंदुस्तान का सबसे बड़ा व आधुनिकतम सॉफ्टवेयर केन्द्र बनाने जा रहे हैं। हम लोग एक क्षेत्र में बहुत ज्यादा रुचि रख रहे हैं और वह है ई-एजुकेशन। व्यक्तिगत रूप से मेरा मन इसमें लगा हैं हम चाहते हैं कि घर-घर में अच्छी शिक्षा पहुंचे यह एक बड़ा कार्य है

Question number: 63 (2 of 4 Based on Passage) Show Passage

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सुब्रत रॉय ने कितनी पूंजी से अपना कारोबार शुरू किया था? उनके अनुसार उनके परिवार में कितने सदस्य हैं?

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सुब्रत राय जी ने मात्र दो हजार रुपए से अपना कारोबार शुरू किया था। उनके अनुसार उनके परिवार में छ: लाख से ज्यादा सदस्य हैं।

Question number: 64 (3 of 4 Based on Passage) Show Passage

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उनके पिताजी क्या कहा करते थे?

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पिताजी की शिक्षा थी कि कोई काम छोटा बड़ा नहीं होता है। काम करने के तरीके पर सब निर्भर करता है। कोई बड़ा काम भी घटिया तरीके से किया जाए, तो वह तुच्छ लगेगा।

Question number: 65 (4 of 4 Based on Passage) Show Passage

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उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक चैनल के ज़रिए खबरों में कौन सा पहलू जोड़ा?

Explanation

इसमें स्थानीय खबरों को दिखाया जाए।

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स्वाद क़ायम है परोंठें वाली गलीं का

दिल्ली के चाँदनी चौक इलाके में कई मशहूर गलियाँ और कूचे हैं। हर एक सँकरी गली अपनी एक खास पहचान लिए हुए है। इन्हीं में सें है मशहूर ’परोंठे वाली गलीं’ जिसकी चर्चा देश विदेश हर जगह सुनी जा सकती हैं। लेकिन एक समय अपने परोंठों के लिए जानी-पहचानी इस गली में अब बड़ा अंतर आ चुका है समय के चक्र और व्यवसायिकता की दौड़ में परोंठे वाली गली अपनी मौलिकता खो चुकी है। सैकड़ों वर्षों से मशहूर इस गली में कभी लगभग सभी दुकानें परोंठें की हुआ करती थीं। लेकिन आज स्थिति ये है कि इस सिर्फ़ तीन दुकानें परोंठें की हैं। बाकी की दुकानें आपको साड़ियों और कपड़ों की दुकानों में परिवर्तित हो चुकी हैं।

आज जो तीन परोंठें की दुकानें आपको इस गली में मिल जाएँगी वे लगभग 100 साल से भी ज्यादा पुरानी हैं। इन दुकानों के मालिको की पांचवीं पीढ़ी के लोग इन दुकानों को चला रहे हैं। इन दुकानों में इंदिरा गांधी, जवाहर लाल नेहरू जैसे बड़े नेताओं की भोजन करते हुए तस्वीरें लगी हैं। जो किसी ज़माने में इनकी महत्ता का आभास दिलाती हैं। अभी भी इन तस्वीरों की छाया में यहाँ बड़ी संख्या में लोग परोंठें खाने आते हैं। इनमें बड़ी संख्या में विदेशी सैलानी भी होते हैं।

दिल्ली के उपनगर गुड़गाँव से परोंठें का मज़ा लेने आए वरूण जैन कहते हैं, ”भीड़-भाड़ वाली इस गली में राह चलते ढेरों लोगों के बीच परोंठें खाने का एक अलग अनुभव है।” वरूण मानते हैं कि पाँच सितारा होटलों में भी उन्हें कभी ऐसा स्वाद चखने को नहीं मिला। परोठें की शौकीन श्रुति का कहना था, ”पिज्ज़्ाा और बर्गर अपनी जगह हैं लेकिन वे इस गली के आकर्षण के साथ मुकाबला नहीं कर सकते।” पत्तलों की जगह अब स्अील की प्लेटों ने ले ली है। लेकिन जो चीज़ नहीं बदली है वह है शुद्धता की गांरटी है जिसका दावा ये दुकानदार अभी भी करते हैं। फ़ास्ट फूड की दुकानों से मुकाबले की बात दुकानदार रमेश चंद्र शर्मा नहीं मानते हैं। वे कहते हैं, ”हमारा मुकाबला केवल अपने आप से है। पित्ज़ा और पराँठे का मुकाबला हो नहीं सकता।”

इन सबके बावजूद पराँठे वानी गली के पराँठा दुकान मालिकों को अपनी दकानों के भविष्य की चिंता है। नई पीढ़ी के उनके बच्चे अब पढ़-लिख चुके हैं। वे नए पेशों में आना चाहते हैं जैसे कि इंजीनियरिंग, डाक्टरी इत्यादी। रमेश चंद्र शर्मा भावुक होकर कहते हैं, ” ये दुकान मेरी माँ है, मेरा मोह है। मेरी ममता इसी से है और किसी से नहीं। कोई-न-कोई तो इसे चलाएगा ही और बाप-दादाओं की विरासत को आगे ले जाएगा।” बदलते स्वाद और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के चलते इस गली का आकर्षण भले ही कम हुआ हो लेकिन उत्सुकता अभी भी कायम है। इन गलियों की परंपरा और इनके चाहने वालों के कारण यह गली अभी भी ज़िंदा है।

Question number: 66 (1 of 8 Based on Passage) Show Passage

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रमेश चंद्र शर्मा की दृष्ठि में वास्तविक मुकाबला किस से है?

Explanation

वे कहते हैं, ”हमारा मुकाबला केवल अपने आप से है। पित्ज़ा और पराँठे का मुकाबला हो नहीं सकता

Question number: 67 (2 of 8 Based on Passage) Show Passage

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क्यों परोंठा दुकान मालिकों के बच्चे इस व्यवसाय में नहीं आना चाहते?

Explanation

नई पीढ़ी के उनके बच्चे अब पढ़-लिख चुके हैं। वे नए पेशों में आना चाहते हैं जैसे कि इंजीनियरिंग, डाक्टरी इत्यादी। इसी कारण से वे इस व्यवसाय में नहीं आना चाहते हैं।

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